कंचनजंघा
सर्पिल की तरह लहराती
बलखाती इठलाती बह रही है तिस्ता नदी
हमारे विचारों को उद्धेलित करती
निकलती है पर्वतराज हिमालय से
कहीं बह रही है अपने उद्धाम वेग से
कहीं शांत मंथर गति से
हरितमा से आच्छादित सघन वन
सूर्य की किरण भी जहाँ डरती है पहुँचने से
बीच में सेउनके गुजरते हैं वाहन
सर्पाकार सी बलखाती सडकों पर
वहाँ से हिमआच्छादित कंचनजंघा की चोटियों को देखना
कभी द्र्श्य कभी अद्रश्य कितना करता है रोमांचित
क्या यही है स्वर्ग कितना अलौकिक सुख
जीवन की आपा-धापी से निकल पडे हैं
कुछ पल को ही सही जब लौटेंगे वापस
ह्लदय में सँजोये न जाने कितनी अदभुत स्मतियाँ
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Sunday, June 14, 2009
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